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जनवरी, 2026 की पोस्ट दिखाई जा रही हैं

Car Accident Claims process in court

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 A Car Accident Claim is a formal request made to an insurance company or a court (Motor Accident Claims Tribunal) to provide financial compensation for losses incurred due to a road accident. ​In India, these claims are governed by the Motor Vehicles Act, 1988 . ​ Types of Car Accident Claims ​ Third-Party Claim: Covers damage caused by your vehicle to another person, their vehicle, or their property. This is legally mandatory. ​ Own Damage (OD) Claim: Covers damages to your own vehicle due to an accident, theft, or natural calamity. This requires a "Comprehensive" insurance policy. ​ Personal Accident Cover: Provides compensation for the owner-driver in case of injury or death. ​ Key Rules and Regulations ​ 1. Compensation Limits ​ Hit and Run: Under the new rules, the compensation is ₹2 Lakhs for death and ₹50,000 for grievous injury from the Solatium Fund. ​ No-Fault Liability (Section 164): In cases of death, a fixed compensation of ₹5 Lakhs is provi...

UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026

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  UGC इक्विटी रेगुलेशन 2026", जिसे आधिकारिक तौर पर "Promotion of Equity in Higher Education Institutions Regulations, 2026" कहा जाता है, को 13 जनवरी 2026 को अधिसूचित किया गया है। यह 2012 के पुराने भेदभाव-विरोधी नियमों का एक अधिक सख्त और व्यापक रूप है। ​इसका मुख्य उद्देश्य उच्च शिक्षण संस्थानों (यूनिवर्सिटी और कॉलेजों) में जाति, धर्म, लिंग और दिव्यांगता के आधार पर होने वाले भेदभाव को खत्म करना है। ​यहाँ इस रेगुलेशन की प्रमुख विशेषताएं और प्रावधान दिए गए हैं: ​1. भेदभाव की व्यापक परिभाषा ​ OBC का समावेश: पहली बार, इन नियमों में स्पष्ट रूप से अन्य पिछड़ा वर्ग (OBC) को भी शामिल किया गया है। इससे पहले जातिगत भेदभाव के नियम मुख्य रूप से SC और ST तक सीमित थे। ​ प्रत्यक्ष और अप्रत्यक्ष भेदभाव: इसमें न केवल स्पष्ट भेदभाव, बल्कि 'सूक्ष्म-आक्रामक व्यवहार' (जैसे सार्वजनिक रूप से रैंक पूछना या लैब ग्रुप्स में अलग-अलग बांटना) को भी शामिल किया गया है। ​2. अनिवार्य संस्थागत ढांचा (Institutional Framework) ​सभी संस्थानों के लिए निम्नलिखित व्यवस्थाएं करना अनिवार्य है:...

एफआईआर रद्द कैसे कराएं : FIR Quashing

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  एफआईआर रद्द कब और कैसे कराएं : FIR Quashing आधार और प्रक्रिया जब किसी व्यक्ति का नाम किसी पुलिस केस में गलत तरीके से डाल दिया जाता है या उसे परेशान करने के लिए झूठा केस किया जाता है, तो उसके पास हाई कोर्ट जाकर उस एफआईआर को रद्द (FIR Quash) कराने का अधिकार होता है। एफआईआर रद्द करवाने के लिए आपको हाई कोर्ट में BNSS की धारा 528 के तहत एक याचिका (Quashing Petition) दायर करनी होती है। हाई कोर्ट FIR रद्द तभी करता है जब उसे लगे कि केस झूठा या निराधार है। इस आर्टिकल में हम विस्तार से समझेंगे कि एफआईआर रद्द (FIR Cancel) कराने के आधार क्या हैं, यह कब और कैसे की जाती है - नियम, शर्ते और हाई कोर्ट में याचिका दायर करने की पूरी प्रक्रिया।  एफआईआर रद्द (FIR Quash) करना क्या है? जब पुलिस किसी मामले में एफआईआर दर्ज करती है, तो उसकी जांच शुरू हो जाती है। लेकिन अगर आरोपी को लगता है कि एफआईआर में लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे हैं या उनके पीछे कोई ठोस सबूत नहीं है, तो वह उस एफआईआर को रद्द कराने के लिए सीधे हाई कोर्ट जा सकता है। हाई कोर्ट के पास यह 'खास पावर' (Inherent ...

बैंक लोन किस्त (EMI) न भरने पर क्या होता है Bank lone

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  लोन किस्त (EMI) न भरने पर क्या होता है: बैंक कार्रवाई और कानूनी अधिकार आजकल घर, गाड़ी, मोबाइल या किसी ज़रूरी काम के लिए लोन लेना आम बात हो गई है। लोग आसान किस्तों में पैसा लौटाने की सोचकर लोन ले लेते हैं। जिसके बाद शुरू में तो सब ठीक चलता है, लेकिन जैसे ही कमाई काम होती है या खर्च बढ़ जाता है, तो हर महीने की किस्त भरना मुश्किल हो जाता है। कई लोग सोचते हैं कि “एक-दो महीने की देरी से कुछ नहीं होगा”, लेकिन ऐसे मामलों में बैंक या उधार देने वाली कंपनी आपकी गाड़ी व घर को जब्त करने से लेकर अन्य कानूनी कार्रवाई भी कर सकती है। इसलिए इस विषय के बारे में सही जानकारी होना बहुत ज़रूरी है। आज के इस लेख में हम सरल भाषा में आपको बताएंगे कि, लोन किस्ते   (Loan EMI) न भरने पर क्या होता है? समय पर ईएमआई​ न भरने पर बैंक क्या लीगल एक्शन ले सकता है? बैंक की कार्रवाई से बचने और डिफॉल्ट हो जाने पर कानूनी अधिकार और विकल्प? EMI क्या होती है - समय पर लोन ईएमआई भुगतान ना करने पर क्या होता है? EMI का पूरा नाम है Equated Monthly Installment, जिसे हिंदी भाषा में समान ...

चेक बाउंस क्या है। Cheque bounse case lawyer in dehli

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  एक चेक बाउंस के मामले में क्या करें और क्या न करें.  Mesothelioma lawyer  चेक क्या है? चेक एक निर्दिष्ट बैंकर द्वारा जारी विनिमय का बिल है और केवल मांग पर ही देय होता है। कानूनी तौर पर, जिस व्यक्ति ने चेक जारी किया है उसे ‘ड्रॉअर/इश्यूअर’ कहा जाता है और जिस व्यक्ति के पक्ष में चेक जारी किया गया है उसे ‘भुगतानकर्त्ता’ कहा जाता है। चेक की आवश्यक विशेषताएं निम्नलिखित हैं: यह लिखित रूप में होना चाहिए यह बिना शर्त आदेश होना चाहिए बैंकर को निर्दिष्ट करना होगा भुगतान एक निर्दिष्ट व्यक्ति को निर्देशित किया जाना चाहिए यह मांग पर देय होना चाहिए यह एक विशिष्ट धनराशि के लिए होना चाहिए ‘ड्रॉअर/इश्यूअर’ के हस्ताक्षर होने चाहिए चेक के पक्षकार ड्रॉअर/इश्यूअर’:  इसे "चेक के लेखक" के रूप में भी जाना जाता है, शब्द "दराज" उस व्यक्ति को संदर्भित करता है जो चेक जारी करता है। (कुछ परिस्थितियों में, भुगतानकर्ता ऋणी हो सकता है।) प्राप्तकर्ता:  वह व्यक्ति जिसके पक्ष मे चेक काटा गया है और जिसे चेक पर निर्दिष्ट राशि देय है, उसे "भुगतानकर्ता...

सावधान! सिलेंडर फटने पर मिलता है 40 लाख का इंश्योरेंस,

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  भारत में कानून सिर्फ कोर्ट-कचहरी तक सीमित नहीं है, बल्कि हमारे रोजमर्रा के जीवन से जुड़े कई ऐसे नियम हैं जो काफी दिलचस्प और हैरान करने वाले हैं। आपके ब्लॉग के लिए यहाँ कुछ बेहतरीन टॉपिक दिए गए हैं: ​⚖️ कानून की 5 दिलचस्प और जरूरी बातें ​1. होटल में फ्री पानी और वॉशरूम का अधिकार ​ 'इंडियन सीरीज एक्ट, 1867' के अनुसार, आप देश के किसी भी होटल (चाहे वह 5-स्टार ही क्यों न हो) में जाकर मुफ्त में पीने का पानी मांग सकते हैं और उनके वॉशरूम का इस्तेमाल कर सकते हैं। इसके लिए होटल मालिक आपको रोक नहीं सकता। ​2. शाम के बाद महिलाओं की गिरफ्तारी पर रोक ​ CRPC की धारा 46(4) के तहत किसी भी महिला को सूरज ढलने के बाद (शाम 6 बजे) और सूरज उगने से पहले (सुबह 6 बजे) गिरफ्तार नहीं किया जा सकता। अगर मामला बहुत गंभीर है, तो पुलिस को गिरफ्तारी के लिए मजिस्ट्रेट से लिखित अनुमति लेनी होगी और साथ में महिला पुलिस अधिकारी का होना अनिवार्य है। ​3. गैस सिलेंडर फटने पर 40 लाख का बीमा ​बहुत कम लोग जानते हैं कि अगर खाना बनाते समय गैस सिलेंडर फट जाए, तो उपभोक्ता (Consumer) 40 लाख रुपये तक के व्यक्तिगत दु...

नामांतरण (Mutation) नियम क्या है

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नामांतरण (Mutation) का अर्थ है   भूमि के स्वामित्व या अधिकार में बदलाव होने पर राजस्व रिकॉर्ड (खसरा, खतौनी, नक्शा) में दर्ज नाम को बदलना , जिसकी प्रक्रिया ऑनलाइन/ऑफलाइन आवेदन, आवश्यक दस्तावेज़ (रजिस्ट्री, पहचान पत्र, खसरा-खतौनी), शुल्क भुगतान और तहसीलदार द्वारा सुनवाई के बाद आदेश जारी होने तक चलती है, जिसके बाद पटवारी इन अभिलेखों को अद्यतन करता है, जिससे स्वामित्व का कानूनी प्रमाण मिलता है और शासकीय योजनाओं का लाभ मिल पाता है; यह प्रक्रिया विवादित न होने पर 30 दिनों के भीतर पूरी हो जानी चाहिए।   नामांतरण के नियम आधार:  नामांतरण स्वीकृत स्वत्व (जैसे बिक्री, वसीयत, उत्तराधिकार) के आधार पर होता है, कब्जे के आधार पर नहीं। समय-सीमा:  अविवादित प्रकरणों में 30 दिनों (या अन्य निर्धारित अवधि) के भीतर निराकरण आवश्यक है। अभिलेख अद्यतन:  आदेश के बाद पटवारी 7 दिनों के भीतर खसरा, खतौनी और नक्शे में प्रविष्टि कर डिजिटल हस्ताक्षर से सत्यापित करता है। लोक सेवा गारंटी:  समय-सीमा में निराकरण न होने पर संबंधित अधिकारियों पर कार्रवाई हो सकती है।   नामांतरण की प्रक्रिया आवे...

दादा की संपत्ति में पोते पोती का अधिकार | बंटवारे के नियम और कानूनी हक़। Property

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  दादा की संपत्ति में पोते पोती का अधिकार | बंटवारे के नियम और कानूनी हक़ दादा की संपत्ति में पोते पोती का अधिकार इस बात पर निर्भर करता है कि संपत्ति पैतृक है या स्व-अर्जित, और उनके माता-पिता जीवित हैं या नहीं। अगर संपत्ति पैतृक है, तो पोता पोती को जन्म से ही अपने पिता के हिस्से के बराबर अधिकार मिलता है, लेकिन यह अधिकार तभी बनता है जब उनके पिता का निधन हो चुका हो। वहीं, अगर संपत्ति दादा की खुद की खरीदी हुई (स्व-अर्जित) है, तो पोते पोतियों का उस पर कोई सीधा कानूनी हक नहीं होता। इस लेख में हम विस्तार से जानेंगे कि दादा की प्रॉपर्टी में किसका कितना अधिकार है? पैतृक संपत्ति का बंटवारा कैसे होता है और अगर माता-पिता जीवित हैं तो क्या वे दादा की संपत्ति पर पोता पोती दावा कर सकते हैं या नहीं? दादा की संपत्ति के प्रकार और उसमे पोते पोती के अधिकार दादा की प्रॉपर्टी में पोते और पोती का अधिकार जन्म से हो होता है या पिता के माध्यम से मिलता है, यह पूरी तरह से संपत्ति प्रकार पर निर्भर करता है। यहाँ हम दादा की संपत्ति के दो मुख्य प्रकारों के बारे में बात करेंगे:  1. दादाजी की स्...