एफआईआर रद्द कैसे कराएं : FIR Quashing
एफआईआर रद्द कब और कैसे कराएं : FIR Quashing आधार और प्रक्रिया
जब किसी व्यक्ति का नाम किसी पुलिस केस में गलत तरीके से डाल दिया जाता है या उसे परेशान करने के लिए झूठा केस किया जाता है, तो उसके पास हाई कोर्ट जाकर उस एफआईआर को रद्द (FIR Quash) कराने का अधिकार होता है। एफआईआर रद्द करवाने के लिए आपको हाई कोर्ट में BNSS की धारा 528 के तहत एक याचिका (Quashing Petition) दायर करनी होती है। हाई कोर्ट FIR रद्द तभी करता है जब उसे लगे कि केस झूठा या निराधार है।
इस आर्टिकल में हम विस्तार से समझेंगे कि एफआईआर रद्द (FIR Cancel) कराने के आधार क्या हैं, यह कब और कैसे की जाती है - नियम, शर्ते और हाई कोर्ट में याचिका दायर करने की पूरी प्रक्रिया।
एफआईआर रद्द (FIR Quash) करना क्या है?
जब पुलिस किसी मामले में एफआईआर दर्ज करती है, तो उसकी जांच शुरू हो जाती है। लेकिन अगर आरोपी को लगता है कि एफआईआर में लगाए गए आरोप पूरी तरह झूठे हैं या उनके पीछे कोई ठोस सबूत नहीं है, तो वह उस एफआईआर को रद्द कराने के लिए सीधे हाई कोर्ट जा सकता है।
हाई कोर्ट के पास यह 'खास पावर' (Inherent Power) होती है कि वह उस एफआईआर को शुरुआती स्टेज पर ही खत्म कर दे। इसका मतलब यह है कि पुलिस उस मामले में आगे कोई जांच या गिरफ्तारी नहीं कर पाएगी और वह केस वहीं बंद हो जाएगा। इसे ही एफआईआर क्वैश (FIR Quash) करना कहते हैं।
एफआईआर क्वैश करने की धारा और हाई कोर्ट शक्ति
BNSS की धारा 528 हाई कोर्ट को यह "खास पावर" देती है कि वह किसी भी ऐसे केस को खत्म कर दे जो कानून का गलत इस्तेमाल कर रहा हो। एफआईआर रद्द करने की ताकत केवल हाई कोर्ट के पास है। जिला अदालत (District Court) या सेशन कोर्ट किसी एफआईआर को रद्द नहीं कर सकते। वे केवल आपको जमानत (Bail) दे सकते हैं या केस के अंत में बरी कर सकते हैं।
किन हालातों में एफआईआर रद्द की जा सकती है : Grounds for Quashing of FIR
हाई कोर्ट हर मामले में हस्तक्षेप नहीं करता। एफआईआर रद्द कराने के लिए कुछ खास आधार होने ज़रूरी हैं:
जब कोई जुर्म ही न बनता हो: एफआईआर में लिखी कहानी को अगर सच भी मान लिया जाए, और फिर भी कानून की किसी धारा के तहत कोई अपराध साबित न हो रहा हो।
झूठे आरोप या गलत नीयत (Malicious Intent): अगर यह साबित हो जाए कि एफआईआर केवल बदला लेने या आरोपी को बदनाम करने के लिए दर्ज की गई है।
सबूतों का न होना: जब पुलिस के पास आरोपी के खिलाफ "पहली नज़र" (Prima Facie) में कोई ठोस कागज़ या गवाह न हो।
दीवानी झगड़े को पुलिस केस बनाना: अगर मामला पैसों के लेन-देन या जमीन के बंटवारे का है (जो सिविल कोर्ट का काम है), लेकिन उसे जानबूझकर "ठगी" या "मार-पीट" का रंग देकर एफआईआर कराई गई हो।
कानूनी रोक: अगर उस केस को करने के लिए कानून में पहले से कोई रोक हो (जैसे समय सीमा निकल जाना)।
आपसी समझौता: कुछ मामलों में (जैसे पति-पत्नी का झगड़ा) अगर दोनों पक्ष सुलह कर लें और हाई कोर्ट को लिखित में दें, तो कोर्ट केस खत्म कर देता है।
एफआईआर रद्द करने की प्रक्रिया
अगर आपको एफआईआर रद्द करवानी है, तो आपको नीचे दिए स्टेप्स का को फॉलो करना चाहिए:
स्टेप 1: वकील से सलाह और अर्जी तैयार करना
सबसे पहले आपको हाई कोर्ट के एक अच्छे आपराधिक वकील से मिलना होगा। वकील आपकी एफआईआर की कॉपी पढ़ेगा और bns की धारा 528 के तहत एक 'क्वैशिंग पिटीशन' (Quashing Petition) तैयार करेगा।
स्टेप 2: हाई कोर्ट में केस फाइल करना
यह अर्जी केवल राज्य के हाई कोर्ट में ही लगाई जा सकती है। निचली अदालतों (जैसे डिस्ट्रिक्ट कोर्ट) के पास एफआईआर रद्द करने की पावर नहीं होती।
स्टेप 3: शुरुआती सुनवाई
जज आपकी अर्जी सुनते हैं। अगर उन्हें लगता है कि आपके पास मज़बूत आधार है, तो वे पुलिस को नोटिस जारी करते हैं और केस को आगे की सुनवाई के लिए रख लेते हैं।
स्टेप 4: गिरफ्तारी पर रोक
अक्सर वकील कोर्ट से मांग करते हैं कि जब तक रद्द करने की अर्जी पर फैसला न आए, तब तक पुलिस आरोपी को गिरफ्तार न करे। इसे 'स्टे आर्डर' (Stay Order) कहते हैं।
स्टेप 5: अंतिम फैसला
दोनों पक्षों की दलीलें सुनने के बाद, अगर कोर्ट संतुष्ट है कि एफआईआर गलत है, तो वह उसे रद्द करने का आदेश दे देता है।
गंभीर अपराधों की धराओं में दर्ज एफआईआर रद्द हो सकती है?
गंभीर अपराध (Heinous Crimes): मर्डर (BNS 103), रेप (BNS 64), डकैती या देश के खिलाफ अपराधों में कोर्ट आमतौर पर एफआईआर रद्द नहीं करता। कोर्ट का मानना है कि ऐसे गंभीर मामलों की पूरी जांच होनी चाहिए और फैसला ट्रायल कोर्ट में ही होना चाहिए।
समझौता भी काम नहीं आता: अगर किसी ने मर्डर किया है और बाद में वह पीड़ित परिवार को पैसे देकर समझौता कर ले, तो भी हाई कोर्ट एफआईआर रद्द नहीं करेगा, क्योंकि यह समाज के खिलाफ अपराध है।
BNS 85 (दहेज) और छोटे झगड़े: पति-पत्नी के विवाद या छोटे-मोटे झगड़ों में अगर समझौता हो जाता है, तो कोर्ट खुशी-खुशी एफआईआर रद्द कर देता है ताकि परिवार बच सके।
सुप्रीम कोर्ट के नियम: सुप्रीम कोर्ट ने साफ़ कहा है कि हाई कोर्ट को अपनी इस पावर का इस्तेमाल बहुत सावधानी से करना चाहिए। अगर अपराध समाज के खिलाफ है, तो समझौता होने पर भी एफआईआर रद्द नहीं की जाएगी।
एफआईआर रद्द कराने में कितना समय और खर्चा लगता है?
समय: हाई कोर्ट में काफी संख्या में मामले लंबित रहते है। एक सामान्य एफआईआर को रद्द कराने में 6 महीने से लेकर 1 साल तक का समय लग सकता है। हालाँकि, गिरफ्तारी पर 'स्टे' आपको पहली या दूसरी सुनवाई में ही मिल सकता है।
खर्चा: यह पूरी तरह आपके वकील के अनुभव और केस की गंभीरता पर निर्भर करता है। हाई कोर्ट के वकीलों की फीस 10,000 रुपये से लेकर लाखों में हो सकती है। इसमें कोर्ट की फीस और टाइपिंग का खर्चा अलग से होता है।
क्या चार्जशीट फाइल होने के बाद भी एफआईआर रद्द हो सकती है?
हाँ, यह एक गलत धारणा है कि चार्जशीट (आरोप पत्र) फाइल होने के बाद कुछ नहीं हो सकता। आप चार्जशीट फाइल होने के बाद भी हाई कोर्ट जा सकते हैं। वकील इस बार केवल एफआईआर नहीं, बल्कि पूरी चार्जशीट और कोर्ट की कार्यवाही (Proceedings) को रद्द कराने की मांग करेगा। अगर हाई कोर्ट को लगता है कि पुलिस ने जांच में कुछ भी साबित नहीं किया है और एफआईआर दर्ज करने का आधार सही नहीं हैं, तो वह पूरा केस खत्म कर सकता है।
अगर हाई कोर्ट अर्जी खारिज कर दे तो क्या करे?
अगर हाई कोर्ट याचिका खारिज कर देता है, तो आप सुप्रीम कोर्ट में अपील कर सकते हैं या फिर आपको ट्रायल कोर्ट में अपना केस लड़ना होगा।
क्या FIR रद्द होने के बाद मैं सामने वाले पर केस कर सकता हूँ?
हाँ। अगर एफआईआर रद्द हो जाती है, तो आप उस व्यक्ति पर मानहानि (Defamation) का केस कर सकते हैं या गलत तरीके से फँसाने के लिए हर्जाना मांग सकते हैं।
क्या 'स्टे आर्डर' का मतलब एफआईआर रद्द होना है?
नहीं। 'स्टे' का मतलब है कि मामला अभी रुका हुआ है। केस तभी खत्म माना जाएगा जब फाइनल ऑर्डर में 'Quashed' शब्द लिखा होगा।
क्या FIR Cancel कराने के लिए समझौता होना ज़रूरी है?
ज़रूरी नहीं है। अगर केस झूठा है और आपके पास सबूत हैं, तो आप बिना समझौते के भी उसे रद्द करवा सकते हैं। समझौता केवल उन मामलों में काम आता है जो कानूनन 'कंपाउंडेबल' (सुलह योग्य) नहीं हैं लेकिन निजी प्रकृति के हैं।
एफआईआर रद्द कराने में कितना समय लगता है?
यह कोर्ट में पेंडिंग मामलो की संख्या और मामले की गंभीरता पर निर्भर करता है। आमतौर पर इसमें 3 महीने से 1 साल तक का समय लग सकता है।
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